सुभाषित - मातृवत परदारेषु
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सुभाषित दो शब्दों सु + भाषित से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है सुन्दर भाषा में कहा गया| सुभाषित जीवन के दीर्घकालिक अनुभवों के भण्डार हैं जिनमे सुखी और आदर्श जीवन की अनमोल सीख छिपी हुई है |
जैसे -
मातृवत परदारेषु,
पर द्रव्ययेषु लोष्ठवत।
आत्मवत सर्वभूतेषु,
यः पश्यति स: पंडित:।।
***अर्थ***
दूसरे की स्त्री को माता के समान,
दूसरे के धन को मिट्टी के समान
तथा जो सबको अपने जैसा मानता है
वही विद्वान है।
देश के लिए जिए, समाज के लिए जिए
देश के लिए जिए, समाज के लिए जिए
देश के लिए जिए, समाज के लिए जिए
ये धड़कने ये स्वास हो, पुण्यभूमि के लिए
गर्व से सभी कहें, हिंदू है हम एक हैं
जाति पंथ भिन्नता, स्नेह सूत्र एक हैं
शुभ्र रंग की छटा, सप्तरंग है लिए।।
ये धड़कने ये स्वास हो, पुण्यभूमि के लिए
कोटि-कोटि कंठ से, हिंदू धर्म गर्जना
नित्य सिद्ध शक्ति से, मातृभू की अर्चना
संघे शक्ति कलियुगे, सुधा है धर्म के लिए।।
ये धड़कने ये स्वास हो, पुण्यभूमि के लिए
व्यक्ति व्यक्ति में जगाए, समाज भक्ति भावना
व्यक्ति को समाज से, जोड़ने की साधना
दांव पर सभी लगे, धर्म कार्य के लिए।।
ये धड़कने ये स्वास हो, पुण्यभूमि के लिए
एक दिव्य ज्योति से, असंख्य दीप जल रहे
कौन लौ बुझा जा सके, आंधियों में जो जले
तेज पुंज हम बढे, तमस चीरते हुए।।
ये धड़कने ये स्वास हो, पुण्यभूमि के लिए
देश के लिए जिए, समाज के लिए जिए
ये धड़कने ये स्वास हो, पुण्यभूमि के लिए
सुभाषित - शक्त्या विहिना पुरुषा हि लोके
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सुभाषित दो शब्दों सु + भाषित से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है सुन्दर भाषा में कहा गया| सुभाषित जीवन के दीर्घकालिक अनुभवों के भण्डार हैं जिनमे सुखी और आदर्श जीवन की अनमोल सीख छिपी हुई है | जैसे -
शक्त्या विहिना पुरुषा हि लोके,
नेतु न राष्ट्रम प्रभवंती नूनम।
देवा अपीमा समुपास्य शक्ति,
शुंभादि दैत्यान समरे निजध्नु।।
***अर्थ***
शक्ति के बिना कोई भी पुरुष
अपने राष्ट्र की रक्षा नहीं कर सकता।
देवता भी शक्ति की आराधना करके
शुंभ आदि दैत्यों का संहार करने में सक्षम हुए।
शुद्ध सात्विक प्रेम अपने कार्य का आधार है
शुद्ध सात्विक प्रेम अपने कार्य का आधार है
शुद्ध सात्विक प्रेम अपने, कार्य का आधार है
प्रेम जो केवल समर्पण, भाग को ही जानता है
और उसमें ही स्वयं की, धन्यता बस मानता है
दिव्य ऐसे प्रेम में, ईश्वर स्वयं साकार है।।
शुद्ध सात्विक प्रेम अपने, कार्य का आधार है
विश्व जननी ने किया, वात्सल्य से पालन हमारा
है कृपा इसकी मिला है, प्राण तन जीवन हमारा
भक्ति से हम को समर्पित, बस यही अधिकार है।।
शुद्ध सात्विक प्रेम अपने, कार्य का आधार है
जाति भाषा प्रांत आदि, वर्ग भेदों को मिटाने
दूर अर्था भाव करने ,तम अविद्या को हटाने
नित्य ज्योतिर्मय हमारा, हृदय स्नेहागार है।।
शुद्ध सात्विक प्रेम अपने, कार्य का आधार है
कोटी आंखों से निरंतर, आज आंसू बह रहे हैं
आज अनगिन बंधु दु:सह, यातनाएं सह रहे हैं
दुख भरे सुख दे सभी को, एक यह आचार है।।
शुद्ध सात्विक प्रेम अपने, कार्य का आधार है
सुभाषित - यत्रोत्साह समारंभॊ
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सुभाषित दो शब्दों सु + भाषित से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है सुन्दर भाषा में कहा गया| सुभाषित जीवन के दीर्घकालिक अनुभवों के भण्डार हैं जिनमे सुखी और आदर्श जीवन की अनमोल सीख छिपी हुई है | जैसे -
यत्रोत्साह समारंभॊ, यत्रालस्य विहीनता।
नय विक्रयं संयोग:, तत्र श्री रचला ध्रुवम।।
***अर्थ***
जहां कार्य उत्साह से आरंभ होता है,
आलस्य नहीं रहता,
नीति व साहस का संगम होता है।
वहां यश (विजय) निश्चित है।।




