सुभाषित - येषां न विद्या न तपो न दानं


[9]

सुभाषित दो शब्दों सु + भाषित से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है सुन्दर भाषा में कहा गया| सुभाषित जीवन के दीर्घकालिक अनुभवों के भण्डार हैं जिनमे सुखी और आदर्श जीवन की अनमोल सीख छिपी हुई है | जैसे - 



येषां न विद्या न तपो न दानं,
ज्ञानं न शीलं न गुणों न धर्म:।
ते मृत्युलोके भूविभारभूता,
मनुष्यरूपेण मृगाश्चरंति।।

***अर्थ***

जो विद्या और तप, दान और ज्ञान, 
शील और धर्म जैसे गुणों से रहित है, 
वह इस पृथ्वी पर भार है 
तथा मनुष्य के रूप में पशु के समान है।



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अब जाग उठो कमर कसो


अब जाग उठो कमर कसो मंजिल की राह बुलाती है 


अब जाग उठो कमर कसो, 
मंजिल की राह बुलाती है 
ललकार रही हमको दुनिया, 
 भेेरी आवाज लगाती है

है ध्येय हमारा दूर सही, 
पर साहस भी तो क्या कम है
 हम राह अनेकों साथी हैं,
 कदमों में अंगद का दम है
 असुरों की दुनिया राख करें,
 वह आग लगानी आती है 
 ललकार ही हमको दुनिया भेरी आवाज लगाती है

पग पग पर कांटे बिछे हुए,
 व्यवहार कुशलता हममें है
 विश्वास विजय का अटल लिए,
निष्ठा कर्मठता हममें है
 विजयी पुरखो की परंपरा, 
अनमोल हमारी थाती है
ललकार रही हमको दुनिया भेरी आवाज लगाती है

हम शेर शिवा के अनुगामी, 
राणा प्रताप की आन लिए
केशव माधव का तेज लिए, 
अर्जुन का शर संधान लिए
 संगठन तंत्र की शक्ति ही,
वैभव का चित्र सजाती है
ललकार रही हमको दुनिया भेरी आवाज लगाती है
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सुभाषित - अमानी मानदो मान्यो


[8]
सुभाषित दो शब्दों सु + भाषित से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है सुन्दर भाषा में कहा गया| सुभाषित जीवन के दीर्घकालिक अनुभवों के भण्डार हैं जिनमे सुखी और आदर्श जीवन की अनमोल सीख छिपी हुई है | जैसे - 


अमानी मानदो मान्यो, लोक स्वामी त्रिलोक धृक।
सुमेधा मेध जो धन्य:, सत्यमेधा धराधर:।।

***अर्थ***

                     जिसे स्वयं के सम्मान की चिंता नहीं, जो दूसरों का सम्मान करता है, इसी कारण सर्वमान्य होता है। वही समाज का नैतिक नेतृत्व प्राप्त करता है। ऐसा कार्यकर्ता मेधावी, धन्य अपनी बात को योग्य रूप से रखने वाला तथा पृथ्वी की भांति सब को संभालने वाला होता है।
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सुभाषित - उद्यमेन ही सिद्धयन्ति


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सुभाषित दो शब्दों सु + भाषित से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है सुन्दर भाषा में कहा गया| सुभाषित जीवन के दीर्घकालिक अनुभवों के भण्डार हैं जिनमे सुखी और आदर्श जीवन की अनमोल सीख छिपी हुई है | जैसे - 

उद्यमेन ही सिद्धयन्ति, 
कार्याणि न मनोरथे।
 न ही सुप्तस्य सिंहस्य, 
प्रविशन्ति मुखे मृगा।।

***अर्थ***

कार्य करने से ही सिद्ध होते हैं, 
केवल इच्छा मात्र से नहीं 
जैसे सोए हुए सिंह के मुख में 
हिरण स्वयं प्रवेश नहीं करते।
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अमृत वचन - डॉक्टर हेडगेवार जी

प्रचलित प्रेरक कथन एवं सुविचार


परम पूज्य डॉक्टर हेडगेवार जी ने कहा है - :

                                                    "अपने समाज का संगठन निर्माण कर उसे बलवान तथा अजेय बनाने के अतिरिक्त हमें कुछ और नहीं करना है। इतना भर कर देने पर सारा काम अपने आप बन जाएगा।"
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अमृत वचन - स्वामी विवेकानंद जी

प्रचलित प्रेरक कथन एवं सुविचार  



स्वामी विवेकानंद जी ने कहा है -:

                                         "ज्ञान, भक्ति, योग और कर्म - यह चार मार्ग मुक्ति की ओर ले जाने वाले हैं। हर एक को उस मार्ग का अनुसरण करना चाहिए जिसके लिए वह योग्य है, लेकिन इस युग में 'कर्म योग' पर विशेष बल देना ही यथेष्ट है।"
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सुभाषित - मातृवत परदारेषु


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सुभाषित दो शब्दों सु + भाषित से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है सुन्दर भाषा में कहा गया| सुभाषित जीवन के दीर्घकालिक अनुभवों के भण्डार हैं जिनमे सुखी और आदर्श जीवन की अनमोल सीख छिपी हुई है | 
जैसे - 



मातृवत परदारेषु, 
पर द्रव्ययेषु लोष्ठवत।
आत्मवत सर्वभूतेषु, 
यः पश्यति स: पंडित:।।

***अर्थ***

दूसरे की स्त्री को माता के समान, 
दूसरे के धन को मिट्टी के समान 
तथा जो सबको अपने जैसा मानता है 
वही विद्वान है।

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देश के लिए जिए, समाज के लिए जिए

देश के लिए जिए, समाज के लिए जिए

देश के लिए जिए, समाज के लिए जिए
ये धड़कने ये स्वास हो, पुण्यभूमि के लिए

गर्व से सभी कहें, हिंदू है हम एक हैं
जाति पंथ भिन्नता, स्नेह सूत्र एक हैं
शुभ्र रंग की छटा, सप्तरंग है लिए।।
ये धड़कने ये स्वास हो, पुण्यभूमि के लिए

कोटि-कोटि कंठ से, हिंदू धर्म गर्जना
नित्य सिद्ध शक्ति से, मातृभू की अर्चना
संघे शक्ति कलियुगे, सुधा है धर्म के लिए।।
ये धड़कने ये स्वास हो, पुण्यभूमि के लिए

व्यक्ति व्यक्ति में जगाए, समाज भक्ति भावना
व्यक्ति को समाज से, जोड़ने की साधना
दांव पर सभी लगे, धर्म कार्य के लिए।।
ये धड़कने ये स्वास हो, पुण्यभूमि के लिए

एक दिव्य ज्योति से, असंख्य दीप जल रहे
 कौन लौ बुझा जा सके, आंधियों में जो जले 
तेज पुंज हम बढे, तमस चीरते हुए।।
ये धड़कने ये स्वास हो, पुण्यभूमि के लिए
देश के लिए जिए, समाज के लिए जिए
ये धड़कने ये स्वास हो, पुण्यभूमि के लिए

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अमृत वचन - डॉक्टर हेडगेवार जी

प्रचलित प्रेरक कथन एवं सुविचार  


परम पूज्य डॉक्टर हेडगेवार जी ने कहा है -:

                                                     "बोलते-चलते, आचार व्यवहार करते तथा प्रत्येक कार्य करते समय हम सावधान रहें कि हमारी किसी भी कृति के कारण संघ के ध्येय तथा कार्य को कोई हानि न पहुंचे।"

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सुभाषित - शक्त्या विहिना पुरुषा हि लोके


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सुभाषित दो शब्दों सु + भाषित से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है सुन्दर भाषा में कहा गया| सुभाषित जीवन के दीर्घकालिक अनुभवों के भण्डार हैं जिनमे सुखी और आदर्श जीवन की अनमोल सीख छिपी हुई है | जैसे - 


शक्त्या विहिना पुरुषा हि लोके,
नेतु न राष्ट्रम प्रभवंती नूनम।
देवा अपीमा समुपास्य शक्ति,
शुंभादि दैत्यान समरे निजध्नु।।

***अर्थ***

शक्ति के बिना कोई भी पुरुष 
अपने राष्ट्र की रक्षा नहीं कर सकता। 
देवता भी शक्ति की आराधना करके 
शुंभ आदि दैत्यों का संहार करने में सक्षम हुए।
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शुद्ध सात्विक प्रेम अपने कार्य का आधार है


शुद्ध सात्विक प्रेम अपने कार्य का आधार है



शुद्ध सात्विक प्रेम अपने, कार्य का आधार है

प्रेम जो केवल समर्पण, भाग को ही जानता है
और उसमें ही स्वयं की, धन्यता बस मानता है
दिव्य ऐसे प्रेम में, ईश्वर स्वयं साकार है।।
शुद्ध सात्विक प्रेम अपने, कार्य का आधार है

विश्व जननी ने किया, वात्सल्य से पालन हमारा
है कृपा इसकी मिला है, प्राण तन जीवन हमारा
भक्ति से हम को समर्पित, बस यही अधिकार है।।
शुद्ध सात्विक प्रेम अपने, कार्य का आधार है

जाति भाषा प्रांत आदि, वर्ग भेदों को मिटाने
 दूर अर्था भाव करने ,तम अविद्या को हटाने
 नित्य ज्योतिर्मय हमारा, हृदय स्नेहागार है।।
शुद्ध सात्विक प्रेम अपने, कार्य का आधार है

कोटी आंखों से निरंतर, आज आंसू बह रहे हैं
आज अनगिन बंधु दु:सह, यातनाएं सह रहे हैं
दुख भरे सुख दे सभी को, एक यह आचार है।।
शुद्ध सात्विक प्रेम अपने, कार्य का आधार है

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सुभाषित - यत्रोत्साह समारंभॊ


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सुभाषित दो शब्दों सु + भाषित से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है सुन्दर भाषा में कहा गया| सुभाषित जीवन के दीर्घकालिक अनुभवों के भण्डार हैं जिनमे सुखी और आदर्श जीवन की अनमोल सीख छिपी हुई है | जैसे - 


यत्रोत्साह समारंभॊ, यत्रालस्य विहीनता।
नय विक्रयं संयोग:, तत्र श्री रचला ध्रुवम।।

***अर्थ***

जहां कार्य उत्साह से आरंभ होता है, 
आलस्य नहीं रहता, 
नीति व साहस का संगम होता है। 
वहां यश (विजय) निश्चित है।।

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अमृत वचन - पंडित दीनदयाल उपाध्याय

प्रचलित प्रेरक कथन एवं सुविचार  


पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ने कहा है - :

                                                    "देश के लिए मरने वाले लोग श्रेष्ठ हैं, पर उनसे भी श्रेष्ठ हैं समाज के लिए जीने वाले। वास्तव में जो समाज के लिए जीता है, वही धर्म और समाज के लिए मरता भी है।"
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Wikipedia

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