विश्व गुरु तव अर्चना में


विश्व गुरु तव अर्चना में


विश्व गुरु तव अर्चना में, भेंट अर्चन क्या करें 
जबकि तन-मन-धन तुम्हारे, और पूजन क्या करें।।

प्राची की अरुणिम छटा है, यज्ञ की आभा विभा है
अरुणा ज्योतिर्मय ध्वजा है, दीप दर्शन क्या करें।।१।।

वेद की पावन ऋचा से, आज तक राग गूंजे,
वंदना के उन स्वरों में, तुच्छ वंदन क्या करें।।२।।

राम के अवतार आए, कर्ममय जीवन चलाए,
अजिर तन तुझको चढ़ाएं, और अर्चना क्या करें।।३।।

पत्र फल और पुष्प जल से, भावना ले ह्रदय तल से
प्राण के पल-पल भी पल से, आज आराधन करें।।४।।






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मुक्त हो गगन सदा

 संचलन गीत

मुक्त हो गगन सदा, स्वर्ग सी बने महि

संघ साधना यही, राष्ट्र अर्चना यही ।।

 

व्यक्ति-व्यक्ति को जुटा, दिव्य संपदा बढ़ा
 देशभक्ति ज्वार ला, लोकशक्ति आ रही 
है स्वतंत्रता यही, पूर्ण क्रांति है सही ।१

संघ साधना यही .....................

 

भारत भूमि हिंदू भू, धर्म भूमि मोक्ष भू 
अर्थ काम सिद्धि भू, विश्व में प्रथम रही 
संगठित प्रयत्न से, हो पुनः प्रथम वही ।२
संघ साधना यही .....................
 
दीनता अभाव का, स्वार्थ के स्वभाव का 
क्षुद्र भेदभाव का, लेश भी रहे नहीं 
मित्र विश्व हो सभी, द्वेष क्लेश हो नहीं ।३
संघ साधना यही .....................
 
नगर ग्राम बढ़ चले, प्रगति पंथ चढ़ चले 
सब समाज साथ ले, कार्य लक्ष्य एक ही 
मां बुला रही हमें, भारती बुला रही  ।४
संघ साधना यही .....................













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दसों दिशाओं में जाएं


दसो दिशाओं में जाएं, दल बादल सा छा जाएं,
उमड़ घुमड़ कर हर धरती को, नंदनवन सा सरसाएं।।

यह मत समझो किसी क्षेत्र को, खाली रह जाने देंगे,
दानवता की बेल विषैली, कहीं नहीं छाने देंगे,
जहां कहीं लूं झुलसाती, अमृत रिमझिम बरसाएं ।।१।।
नंदन वन सा सरसाएं ........

फूल सुकोमल धरती पर हम, बिजली नहीं गिराते हैं
किंतु अडिले बालू टीले, वर्षा में ढह जाते हैं,
ध्वंस हमारा काम नहीं, अविरल जीवन विकसाएं ।।२।।
नंदन वन सा सरसाएं ........

देश देश के जीवन दर्शन, अनुभव कहता पूर्ण नहीं,
आदि सृष्टि से हिंदू धर्म की, पूर्ण धर्म उपलब्धि रही,
ज्ञान किरण फिर प्रकटाएं, शांति व्यवस्था समझाएं ।।३।।
नंदन वन सा सरसाएं ........

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मन मस्त फकीरी धारी है



मन मस्त फकीरी धारी है 

मन मस्त फकीरी धारी है 
अब एक ही धुन जय जय भारत 
जय जय भारत जय जय भारत ।।

हम धन्य हैं इस जग जननी की,
 सेवा का अवसर है पाया,
इसकी माटी वायु जल से,
 दुर्लभ जीवन है विकसाया,
यह पुष्प इसी के चरणों में,
 मां प्राणों से भी प्यारी है ।।१।।

सुंदर सपने में आकर्षण,
 सब तोड़ चले मुख मोड़ चले,
वैभव महलों का क्या करना,
 सोते सुख से आकाश तले,
साधन की ओर न ताकेंगे,
 कांटो की राह हमारी है ।।२।।

ऋषि मुनियों संतो का तप,
 अनमोल हमारी थाती है,
बलिदानी वीरों की गाथा,
 अपने रग रग लहराती है,
गौरवमय नव इतिहास रचे,
 अब अपनी ही तो बारी है ।।३।।





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निज गौरव को निज वैभव को


निज गौरव को निज वैभव को

निज गौरव को निज वैभव को, 
क्यों हिन्दू बहादुर भूल गए
उपदेश दिया जो गीता में,
क्यूं सुनना सुनाना भूल गए ।।

रावण ने सीता चुराई थी,
 हनुमान ने लंका जलाई थी ।
अब लाखों सीते हरी गई,
 क्यों लंका जलाना भूल गए ।।१।।

कान्हा ने रास रचाया था,
 दुष्टों पर चक्र चलाया था
अब रास रचाना याद रहा,
 क्यूं चक्र चलाना भूल गए ।।२।।

गीता का ज्ञान कराया था,
 अर्जुन को वीर बनाया था, 
बंसी का बजाना याद रहा,
 क्यूं वीर बनाना भूल गए ।।३।।

राणा ने राह बनाई थी,
 शिवराज ने भी अपनाई थी,
जिस राह पर बंदा वीर चले,
 उस राह पे चलना भूल गए।।४।।

केशव का भी उपदेश यही,
 माधव का भी संदेश यही,
जिस मां की गोद में जन्म लिया,
 क्यूं मान बढ़ाना भूल गए ।।५।।
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भारत माता तेरा आंचल



भारत माता तेरा आंचल


भारत माता तेरा आंचल, हरा भरा धानी धानी ।
मीठा-मीठा चमचम करता, तेरी नदियों का पानी।।
हरी हो गई बंजर धरती नाचे चरणों में बिजली
सोना चांदी उगल रहा है तेरी नदियों का पानी।।१।।
भारत माता तेरा आंचल ......
तेरा मान बढ़ाने वाले, तेरे घर के हैं रखवाले ।
तेरे ऊंचे ऊंचे पर्वत, निडर बहादुर सेनानी ।।२।।
भारत माता तेरा आंचल ......
मस्त हवा जब लहर आती है, दूर-दूर तक पहुंचाती है
जग को मीत बनाने वाली, मधुर मधुर तेरी वाणी ।।३।।
भारत माता तेरा आंचल .....
जीवन पुष्प चढ़ा चरणों में, मांगे मातृभूमि से यह वर
तेरा वैभव अमर रहे मां, हम दिन चार रहे न रहे ।
भारत माता तेरा आंचल ......













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ना हो साथ कोई अकेले चलो तुम



ना हो साथ कोई अकेले बढ़ो तुम 

ना हो साथ कोई अकेले बढ़ो तुम 
सफलता तुम्हारे चरण चूम लेगी।।
सदा जो जगाए बिना ही जगा है,
अंधेरा उसे देखकर ही भगा है।
वही बीज पनपा पनपना जिसे था,
घुना क्या किसी के उगाए उगा है।
अगर उग सको तो उगो सूर्य सा तुम,
प्रखरता तुम्हारे चरण चूम लेगी।।१।।
ना हो साथ कोई.........
सही राह को छोड़कर जो मुड़े हैं,  
वही देख कर दूसरों को कुढ़े हैं।
बिना पंख तौले उड़े जो गगन में,
न संबंध उनके गगन से जुड़े हैं।
अगर बन सको तो पखेरू बनो तुम,
प्रवरता तुम्हारे चरण चूम लेगी।।२।।
ना हो साथ कोई.........
न जो बर्फ की आंधियों से लड़े हैं,
कभी पग न उनके शिखर पर पड़े हैं।
जिन्हे लक्ष्य से कम अधिक प्यार खुद से,
वही जी चुराके तरसते खड़े हैं।
अगर जी सको तो जियो जूझकर तुम, 
अमरता तुम्हारे चरण चूम लेगी ।।३।।
ना हो साथ कोई.........

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अमृत वचन - डॉक्टर हेडगेवार जी

प्रचलित प्रेरक कथन एवं सुविचार  


परम पूज्य डॉक्टर हेडगेवार जी ने कहा है - :

                                                               "केवल भूमि के किसी टुकड़े को राष्ट्र नहीं कहते हैं। एक विचार, एक आचार, एक सभ्यता एवं एक परंपरा से जो लोग पुरातन काल से चले आए हैं, उन्हीं लोगों से राष्ट्र बनता है। इस देश को हमारे ही कारण हिन्दुस्थान नाम दिया गया है।"

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अमृत वचन - श्री गुरु जी

प्रचलित प्रेरक कथन एवं सुविचार  




पूज्य श्री गुरु जी ने कहा है -:

                                             "विजय निश्चित है, क्योंकि धर्म के साथ श्री भगवान और उनके साथ विजय रहती है। तो फिर भी हृदयाकाश से जगदाकाश तक भारत माता की जय ध्वनि ललकार उठो और कार्य पूर्ण करके ही रहो।"
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भारत वन्दे मातरम्


भारत वंदे मातरम

वन्दे मातरम्  वन्दे मातरम्
भारत वंदे मातरम् भारत वंदे मातरम्
रुक ना पाएं तूफानों में सबके आगे बढ़े कदम
जीवन पुष्प चढ़ाने निकले माता के चरणों में हम ।।धृ।।

मस्तक पर हिमराज विराजे, उन्नत माथा माता का
चरण धो रहा विशाल सागर, देश यही सुंदरता का
हरियाली साड़ी पहनी मां, गीत तुम्हारे गाए हम ।।१।।
वन्दे मातरम्  वन्दे मातरम्

नदियन की पावन धारा है, मंगल माला गंगा की
कमर बन्ध है विंध्याद्रि का, सतपुड़ा की श्रेणी की
सहयाद्री का वज्र हस्त है, पौरुषता पहचाने हम।।२।।
वन्दे मातरम्  वन्दे मातरम्

नहीं किसी के सामने हमने, अपना शीश झुकाया है
जो हम से टकराने आया, काल उसी का आया है
तेरा वैभव अमर रहे मां, विजय ध्वजा फहराएं हम।।३।।
वन्दे मातरम्  वन्दे मातरम्

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सुभाषित - येषां न विद्या न तपो न दानं


[9]

सुभाषित दो शब्दों सु + भाषित से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है सुन्दर भाषा में कहा गया| सुभाषित जीवन के दीर्घकालिक अनुभवों के भण्डार हैं जिनमे सुखी और आदर्श जीवन की अनमोल सीख छिपी हुई है | जैसे - 



येषां न विद्या न तपो न दानं,
ज्ञानं न शीलं न गुणों न धर्म:।
ते मृत्युलोके भूविभारभूता,
मनुष्यरूपेण मृगाश्चरंति।।

***अर्थ***

जो विद्या और तप, दान और ज्ञान, 
शील और धर्म जैसे गुणों से रहित है, 
वह इस पृथ्वी पर भार है 
तथा मनुष्य के रूप में पशु के समान है।



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अब जाग उठो कमर कसो


अब जाग उठो कमर कसो मंजिल की राह बुलाती है 


अब जाग उठो कमर कसो, 
मंजिल की राह बुलाती है 
ललकार रही हमको दुनिया, 
 भेेरी आवाज लगाती है

है ध्येय हमारा दूर सही, 
पर साहस भी तो क्या कम है
 हम राह अनेकों साथी हैं,
 कदमों में अंगद का दम है
 असुरों की दुनिया राख करें,
 वह आग लगानी आती है 
 ललकार ही हमको दुनिया भेरी आवाज लगाती है

पग पग पर कांटे बिछे हुए,
 व्यवहार कुशलता हममें है
 विश्वास विजय का अटल लिए,
निष्ठा कर्मठता हममें है
 विजयी पुरखो की परंपरा, 
अनमोल हमारी थाती है
ललकार रही हमको दुनिया भेरी आवाज लगाती है

हम शेर शिवा के अनुगामी, 
राणा प्रताप की आन लिए
केशव माधव का तेज लिए, 
अर्जुन का शर संधान लिए
 संगठन तंत्र की शक्ति ही,
वैभव का चित्र सजाती है
ललकार रही हमको दुनिया भेरी आवाज लगाती है
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सुभाषित - अमानी मानदो मान्यो


[8]
सुभाषित दो शब्दों सु + भाषित से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है सुन्दर भाषा में कहा गया| सुभाषित जीवन के दीर्घकालिक अनुभवों के भण्डार हैं जिनमे सुखी और आदर्श जीवन की अनमोल सीख छिपी हुई है | जैसे - 


अमानी मानदो मान्यो, लोक स्वामी त्रिलोक धृक।
सुमेधा मेध जो धन्य:, सत्यमेधा धराधर:।।

***अर्थ***

                     जिसे स्वयं के सम्मान की चिंता नहीं, जो दूसरों का सम्मान करता है, इसी कारण सर्वमान्य होता है। वही समाज का नैतिक नेतृत्व प्राप्त करता है। ऐसा कार्यकर्ता मेधावी, धन्य अपनी बात को योग्य रूप से रखने वाला तथा पृथ्वी की भांति सब को संभालने वाला होता है।
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सुभाषित - उद्यमेन ही सिद्धयन्ति


[7]

सुभाषित दो शब्दों सु + भाषित से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है सुन्दर भाषा में कहा गया| सुभाषित जीवन के दीर्घकालिक अनुभवों के भण्डार हैं जिनमे सुखी और आदर्श जीवन की अनमोल सीख छिपी हुई है | जैसे - 

उद्यमेन ही सिद्धयन्ति, 
कार्याणि न मनोरथे।
 न ही सुप्तस्य सिंहस्य, 
प्रविशन्ति मुखे मृगा।।

***अर्थ***

कार्य करने से ही सिद्ध होते हैं, 
केवल इच्छा मात्र से नहीं 
जैसे सोए हुए सिंह के मुख में 
हिरण स्वयं प्रवेश नहीं करते।
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अमृत वचन - डॉक्टर हेडगेवार जी

प्रचलित प्रेरक कथन एवं सुविचार


परम पूज्य डॉक्टर हेडगेवार जी ने कहा है - :

                                                    "अपने समाज का संगठन निर्माण कर उसे बलवान तथा अजेय बनाने के अतिरिक्त हमें कुछ और नहीं करना है। इतना भर कर देने पर सारा काम अपने आप बन जाएगा।"
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अमृत वचन - स्वामी विवेकानंद जी

प्रचलित प्रेरक कथन एवं सुविचार  



स्वामी विवेकानंद जी ने कहा है -:

                                         "ज्ञान, भक्ति, योग और कर्म - यह चार मार्ग मुक्ति की ओर ले जाने वाले हैं। हर एक को उस मार्ग का अनुसरण करना चाहिए जिसके लिए वह योग्य है, लेकिन इस युग में 'कर्म योग' पर विशेष बल देना ही यथेष्ट है।"
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सुभाषित - मातृवत परदारेषु


[6]

सुभाषित दो शब्दों सु + भाषित से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है सुन्दर भाषा में कहा गया| सुभाषित जीवन के दीर्घकालिक अनुभवों के भण्डार हैं जिनमे सुखी और आदर्श जीवन की अनमोल सीख छिपी हुई है | 
जैसे - 



मातृवत परदारेषु, 
पर द्रव्ययेषु लोष्ठवत।
आत्मवत सर्वभूतेषु, 
यः पश्यति स: पंडित:।।

***अर्थ***

दूसरे की स्त्री को माता के समान, 
दूसरे के धन को मिट्टी के समान 
तथा जो सबको अपने जैसा मानता है 
वही विद्वान है।

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देश के लिए जिए, समाज के लिए जिए

देश के लिए जिए, समाज के लिए जिए

देश के लिए जिए, समाज के लिए जिए
ये धड़कने ये स्वास हो, पुण्यभूमि के लिए

गर्व से सभी कहें, हिंदू है हम एक हैं
जाति पंथ भिन्नता, स्नेह सूत्र एक हैं
शुभ्र रंग की छटा, सप्तरंग है लिए।।
ये धड़कने ये स्वास हो, पुण्यभूमि के लिए

कोटि-कोटि कंठ से, हिंदू धर्म गर्जना
नित्य सिद्ध शक्ति से, मातृभू की अर्चना
संघे शक्ति कलियुगे, सुधा है धर्म के लिए।।
ये धड़कने ये स्वास हो, पुण्यभूमि के लिए

व्यक्ति व्यक्ति में जगाए, समाज भक्ति भावना
व्यक्ति को समाज से, जोड़ने की साधना
दांव पर सभी लगे, धर्म कार्य के लिए।।
ये धड़कने ये स्वास हो, पुण्यभूमि के लिए

एक दिव्य ज्योति से, असंख्य दीप जल रहे
 कौन लौ बुझा जा सके, आंधियों में जो जले 
तेज पुंज हम बढे, तमस चीरते हुए।।
ये धड़कने ये स्वास हो, पुण्यभूमि के लिए
देश के लिए जिए, समाज के लिए जिए
ये धड़कने ये स्वास हो, पुण्यभूमि के लिए

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अमृत वचन - डॉक्टर हेडगेवार जी

प्रचलित प्रेरक कथन एवं सुविचार  


परम पूज्य डॉक्टर हेडगेवार जी ने कहा है -:

                                                     "बोलते-चलते, आचार व्यवहार करते तथा प्रत्येक कार्य करते समय हम सावधान रहें कि हमारी किसी भी कृति के कारण संघ के ध्येय तथा कार्य को कोई हानि न पहुंचे।"

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सुभाषित - शक्त्या विहिना पुरुषा हि लोके


[5]

सुभाषित दो शब्दों सु + भाषित से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है सुन्दर भाषा में कहा गया| सुभाषित जीवन के दीर्घकालिक अनुभवों के भण्डार हैं जिनमे सुखी और आदर्श जीवन की अनमोल सीख छिपी हुई है | जैसे - 


शक्त्या विहिना पुरुषा हि लोके,
नेतु न राष्ट्रम प्रभवंती नूनम।
देवा अपीमा समुपास्य शक्ति,
शुंभादि दैत्यान समरे निजध्नु।।

***अर्थ***

शक्ति के बिना कोई भी पुरुष 
अपने राष्ट्र की रक्षा नहीं कर सकता। 
देवता भी शक्ति की आराधना करके 
शुंभ आदि दैत्यों का संहार करने में सक्षम हुए।
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