सुभाषित - येषां न विद्या न तपो न दानं


[9]

सुभाषित दो शब्दों सु + भाषित से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है सुन्दर भाषा में कहा गया| सुभाषित जीवन के दीर्घकालिक अनुभवों के भण्डार हैं जिनमे सुखी और आदर्श जीवन की अनमोल सीख छिपी हुई है | जैसे - 



येषां न विद्या न तपो न दानं,
ज्ञानं न शीलं न गुणों न धर्म:।
ते मृत्युलोके भूविभारभूता,
मनुष्यरूपेण मृगाश्चरंति।।

***अर्थ***

जो विद्या और तप, दान और ज्ञान, 
शील और धर्म जैसे गुणों से रहित है, 
वह इस पृथ्वी पर भार है 
तथा मनुष्य के रूप में पशु के समान है।



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अब जाग उठो कमर कसो


अब जाग उठो कमर कसो मंजिल की राह बुलाती है 


अब जाग उठो कमर कसो, 
मंजिल की राह बुलाती है 
ललकार रही हमको दुनिया, 
 भेेरी आवाज लगाती है

है ध्येय हमारा दूर सही, 
पर साहस भी तो क्या कम है
 हम राह अनेकों साथी हैं,
 कदमों में अंगद का दम है
 असुरों की दुनिया राख करें,
 वह आग लगानी आती है 
 ललकार ही हमको दुनिया भेरी आवाज लगाती है

पग पग पर कांटे बिछे हुए,
 व्यवहार कुशलता हममें है
 विश्वास विजय का अटल लिए,
निष्ठा कर्मठता हममें है
 विजयी पुरखो की परंपरा, 
अनमोल हमारी थाती है
ललकार रही हमको दुनिया भेरी आवाज लगाती है

हम शेर शिवा के अनुगामी, 
राणा प्रताप की आन लिए
केशव माधव का तेज लिए, 
अर्जुन का शर संधान लिए
 संगठन तंत्र की शक्ति ही,
वैभव का चित्र सजाती है
ललकार रही हमको दुनिया भेरी आवाज लगाती है
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सुभाषित - अमानी मानदो मान्यो


[8]
सुभाषित दो शब्दों सु + भाषित से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है सुन्दर भाषा में कहा गया| सुभाषित जीवन के दीर्घकालिक अनुभवों के भण्डार हैं जिनमे सुखी और आदर्श जीवन की अनमोल सीख छिपी हुई है | जैसे - 


अमानी मानदो मान्यो, लोक स्वामी त्रिलोक धृक।
सुमेधा मेध जो धन्य:, सत्यमेधा धराधर:।।

***अर्थ***

                     जिसे स्वयं के सम्मान की चिंता नहीं, जो दूसरों का सम्मान करता है, इसी कारण सर्वमान्य होता है। वही समाज का नैतिक नेतृत्व प्राप्त करता है। ऐसा कार्यकर्ता मेधावी, धन्य अपनी बात को योग्य रूप से रखने वाला तथा पृथ्वी की भांति सब को संभालने वाला होता है।
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सुभाषित - उद्यमेन ही सिद्धयन्ति


[7]

सुभाषित दो शब्दों सु + भाषित से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है सुन्दर भाषा में कहा गया| सुभाषित जीवन के दीर्घकालिक अनुभवों के भण्डार हैं जिनमे सुखी और आदर्श जीवन की अनमोल सीख छिपी हुई है | जैसे - 

उद्यमेन ही सिद्धयन्ति, 
कार्याणि न मनोरथे।
 न ही सुप्तस्य सिंहस्य, 
प्रविशन्ति मुखे मृगा।।

***अर्थ***

कार्य करने से ही सिद्ध होते हैं, 
केवल इच्छा मात्र से नहीं 
जैसे सोए हुए सिंह के मुख में 
हिरण स्वयं प्रवेश नहीं करते।
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अमृत वचन - डॉक्टर हेडगेवार जी

प्रचलित प्रेरक कथन एवं सुविचार


परम पूज्य डॉक्टर हेडगेवार जी ने कहा है - :

                                                    "अपने समाज का संगठन निर्माण कर उसे बलवान तथा अजेय बनाने के अतिरिक्त हमें कुछ और नहीं करना है। इतना भर कर देने पर सारा काम अपने आप बन जाएगा।"
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अमृत वचन - स्वामी विवेकानंद जी

प्रचलित प्रेरक कथन एवं सुविचार  



स्वामी विवेकानंद जी ने कहा है -:

                                         "ज्ञान, भक्ति, योग और कर्म - यह चार मार्ग मुक्ति की ओर ले जाने वाले हैं। हर एक को उस मार्ग का अनुसरण करना चाहिए जिसके लिए वह योग्य है, लेकिन इस युग में 'कर्म योग' पर विशेष बल देना ही यथेष्ट है।"
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सुभाषित - मातृवत परदारेषु


[6]

सुभाषित दो शब्दों सु + भाषित से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है सुन्दर भाषा में कहा गया| सुभाषित जीवन के दीर्घकालिक अनुभवों के भण्डार हैं जिनमे सुखी और आदर्श जीवन की अनमोल सीख छिपी हुई है | 
जैसे - 



मातृवत परदारेषु, 
पर द्रव्ययेषु लोष्ठवत।
आत्मवत सर्वभूतेषु, 
यः पश्यति स: पंडित:।।

***अर्थ***

दूसरे की स्त्री को माता के समान, 
दूसरे के धन को मिट्टी के समान 
तथा जो सबको अपने जैसा मानता है 
वही विद्वान है।

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देश के लिए जिए, समाज के लिए जिए

देश के लिए जिए, समाज के लिए जिए

देश के लिए जिए, समाज के लिए जिए
ये धड़कने ये स्वास हो, पुण्यभूमि के लिए

गर्व से सभी कहें, हिंदू है हम एक हैं
जाति पंथ भिन्नता, स्नेह सूत्र एक हैं
शुभ्र रंग की छटा, सप्तरंग है लिए।।
ये धड़कने ये स्वास हो, पुण्यभूमि के लिए

कोटि-कोटि कंठ से, हिंदू धर्म गर्जना
नित्य सिद्ध शक्ति से, मातृभू की अर्चना
संघे शक्ति कलियुगे, सुधा है धर्म के लिए।।
ये धड़कने ये स्वास हो, पुण्यभूमि के लिए

व्यक्ति व्यक्ति में जगाए, समाज भक्ति भावना
व्यक्ति को समाज से, जोड़ने की साधना
दांव पर सभी लगे, धर्म कार्य के लिए।।
ये धड़कने ये स्वास हो, पुण्यभूमि के लिए

एक दिव्य ज्योति से, असंख्य दीप जल रहे
 कौन लौ बुझा जा सके, आंधियों में जो जले 
तेज पुंज हम बढे, तमस चीरते हुए।।
ये धड़कने ये स्वास हो, पुण्यभूमि के लिए
देश के लिए जिए, समाज के लिए जिए
ये धड़कने ये स्वास हो, पुण्यभूमि के लिए

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अमृत वचन - डॉक्टर हेडगेवार जी

प्रचलित प्रेरक कथन एवं सुविचार  


परम पूज्य डॉक्टर हेडगेवार जी ने कहा है -:

                                                     "बोलते-चलते, आचार व्यवहार करते तथा प्रत्येक कार्य करते समय हम सावधान रहें कि हमारी किसी भी कृति के कारण संघ के ध्येय तथा कार्य को कोई हानि न पहुंचे।"

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सुभाषित - शक्त्या विहिना पुरुषा हि लोके


[5]

सुभाषित दो शब्दों सु + भाषित से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है सुन्दर भाषा में कहा गया| सुभाषित जीवन के दीर्घकालिक अनुभवों के भण्डार हैं जिनमे सुखी और आदर्श जीवन की अनमोल सीख छिपी हुई है | जैसे - 


शक्त्या विहिना पुरुषा हि लोके,
नेतु न राष्ट्रम प्रभवंती नूनम।
देवा अपीमा समुपास्य शक्ति,
शुंभादि दैत्यान समरे निजध्नु।।

***अर्थ***

शक्ति के बिना कोई भी पुरुष 
अपने राष्ट्र की रक्षा नहीं कर सकता। 
देवता भी शक्ति की आराधना करके 
शुंभ आदि दैत्यों का संहार करने में सक्षम हुए।
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शुद्ध सात्विक प्रेम अपने कार्य का आधार है


शुद्ध सात्विक प्रेम अपने कार्य का आधार है



शुद्ध सात्विक प्रेम अपने, कार्य का आधार है

प्रेम जो केवल समर्पण, भाग को ही जानता है
और उसमें ही स्वयं की, धन्यता बस मानता है
दिव्य ऐसे प्रेम में, ईश्वर स्वयं साकार है।।
शुद्ध सात्विक प्रेम अपने, कार्य का आधार है

विश्व जननी ने किया, वात्सल्य से पालन हमारा
है कृपा इसकी मिला है, प्राण तन जीवन हमारा
भक्ति से हम को समर्पित, बस यही अधिकार है।।
शुद्ध सात्विक प्रेम अपने, कार्य का आधार है

जाति भाषा प्रांत आदि, वर्ग भेदों को मिटाने
 दूर अर्था भाव करने ,तम अविद्या को हटाने
 नित्य ज्योतिर्मय हमारा, हृदय स्नेहागार है।।
शुद्ध सात्विक प्रेम अपने, कार्य का आधार है

कोटी आंखों से निरंतर, आज आंसू बह रहे हैं
आज अनगिन बंधु दु:सह, यातनाएं सह रहे हैं
दुख भरे सुख दे सभी को, एक यह आचार है।।
शुद्ध सात्विक प्रेम अपने, कार्य का आधार है

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सुभाषित - यत्रोत्साह समारंभॊ


[4]

सुभाषित दो शब्दों सु + भाषित से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है सुन्दर भाषा में कहा गया| सुभाषित जीवन के दीर्घकालिक अनुभवों के भण्डार हैं जिनमे सुखी और आदर्श जीवन की अनमोल सीख छिपी हुई है | जैसे - 


यत्रोत्साह समारंभॊ, यत्रालस्य विहीनता।
नय विक्रयं संयोग:, तत्र श्री रचला ध्रुवम।।

***अर्थ***

जहां कार्य उत्साह से आरंभ होता है, 
आलस्य नहीं रहता, 
नीति व साहस का संगम होता है। 
वहां यश (विजय) निश्चित है।।

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अमृत वचन - पंडित दीनदयाल उपाध्याय

प्रचलित प्रेरक कथन एवं सुविचार  


पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ने कहा है - :

                                                    "देश के लिए मरने वाले लोग श्रेष्ठ हैं, पर उनसे भी श्रेष्ठ हैं समाज के लिए जीने वाले। वास्तव में जो समाज के लिए जीता है, वही धर्म और समाज के लिए मरता भी है।"
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सुभाषित - विदेशेषू धनं विद्या



[3]
सुभाषित दो शब्दों सु + भाषित से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है सुन्दर भाषा में कहा गया| सुभाषित जीवन के दीर्घकालिक अनुभवों के भण्डार हैं जिनमे सुखी और आदर्श जीवन की अनमोल सीख छिपी हुई है | जैसे - 


विदेशेषू धनं विद्या, 
व्यसनेषू धनं मति:।
परलोके धनं धर्म, 
शीलं सर्वत्र वै धनं।।

***अर्थ***

विदेश में विद्या ही धन है, 
संकट में बुद्धि ही धन है।
 मृत्यु के उपरांत धर्म ही धन है।
 लेकिन अच्छा आचरण सभी जगह धन है।
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जय मातृभूमि जीवन भर


जय मातृभूमि जीवनभर


जय मातृभूमि जीवनभर 
निशि दिन तेरा ही गुण गाएं
फिर भी तेरा पार नहीं हम पाए 

सबसे ऊंचा मस्तक तेरा, 
चरणों में सागर का घेरा 
दसों दिशाएं सांझ सवेरे,
 तुझको शीश झुकाए 
फिर भी तेरा पार नहीं हम पाएं ।१

तूने दिया खेलता बचपन,
फिर अथाह  बलशाली यौवन  
शत-शत जीवन तेरी सेवा, 
का हम अवसर पाए 
फिर अभी तेरा पार नहीं हम पाए ।२

भौतिकता में जब जग मोहित,
 तू थी  दर्शन से आच्छादित
 समय-समय पर ईश मुखों से,
 तूने धर्म उपदेश कराए
 फिर भी तेरा पार नहीं हम पाएं ।३

जय मातृभूमि जीवनभर 
निशि दिन तेरा ही गुणगान
फिर भी तेरा पार नहीं हम पाए 
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बोधकथा - रहट की टक टक


रहट की टक टक



                                    एक घुड़सवार था घोड़े पर सवार होकर कहीं जा रहा था। धूप तेज थी। वह घोड़े को तेज दौड़ा रहा था। घुड़सवार को प्यास लगी। घोड़ा भी थक गया था। काफी दूरी पर घुड़सवार ने एक रहट चलते देखा। घुड़सवार ने कहा, अच्छा हुआ। चलो रहट से पानी पी ले और घोड़े को भी पानी पिला दे। वह उस स्थान पर जहां रहट चल रही थी पहुंचा। घोड़े को बांध दिया। पहले उसने अपने हाथ पैर धोए और मुंह भी धोया और पानी पिया। उसने घोड़े को लाकर पानी के पास खड़ा किया। घोड़े ने जैसे ही पानी में मुंह लगाया रहट की बाल्टी बोली 'खट'। घोड़ा उस और चौकन्ना हो कर देखने लगा।
                              घोड़े की आदत थी आवाज सुनकर चौकन्ना होना। जब घोड़े ने पानी में मुंह लगाया रहट की बाल्टीयों की टक-टक, खट-खट के कारण उधर ही चौकन्ना होकर देखता था। घुड़सवार ने रहट चलाने वाले से कहा भाई रहट चलाना बंद कर दो ताकि मेरा घोड़ा पानी पी ले। उसने रहट चलाना बंद कर दिया तो पानी आना बंद हो गया और जो पानी नाली में था वह भी बह गया घोड़ा पानी नहीं पी सका।
                                 कई बार रहट बंद करने के बाद भी जब घोड़ा पानी नहीं पी सका तो रहट वाले ने कहा "आपके घोड़े की आदत आवाज सुनकर चौकन्ना होने की है। रहट की आदत टकटक करने की है।" यदि घोड़े को पानी पीना है तो उसे अपनी आदत में बदल करना होगा। आवाज सुनकर चौकन्ना होने की आदत उसे छोड़नी होगी। टक-टक होता रहे तो फिर भी वह पानी पीता रहे यदि ऐसा हुआ तो तभी घोड़ा पानी पी सकेगा अन्यथा प्यासा का प्यासा ही रहेगा।
                              इसलिए कार्य में यदि कोई छोटी-मोटी परशानी (खटर पटर) होती है, तो परेशान नहीं होना चाहिए। कार्य चल रहा है तो कुछ ना कुछ परेशानी तो आयेगी ही।

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वीर हकीकत राय


वीर हकीकत राय





                                              शाहजहां के शासनकाल में पश्चिमी पंजाब (पाकिस्तान) के प्रसिद्ध शहर सियालकोट के खत्री परिवार में एक बालक ने 1619 को जन्म लिया। बच्चे की श्री माता गोरा देवी और पिता श्री भागवत जी थे। बालक का नाम हकीकत राय रखा गया। 5 वर्ष की आयु में एक विद्वान ब्राह्मण के पास हिंदी, संस्कृत पढ़ने भेजा गया। छोटी आयु में ही अच्छी धार्मिक शिक्षा प्राप्त करने के कारण हिंदुत्व के संस्कार उसमें कूट कूट कर भर गए थे। तत्कालीन प्रथा के अनुसार हकीकत राय का विवाह 19 वर्ष की छोटी आयु में ही बटाला के एक सिख श्री किशन सिंह की पुत्री लक्ष्मी देवी के साथ हो गया विवाह के बाद पिताजी ने हकीकत राय को फारसी (उस समय की राजभाषा) पढ़ने के लिए मौलवी के पास भेज दिया। वहां और भी बच्चे पढ़ते थे और वे सभी मुसलमान थे।
                                1 दिन मौलवी कहीं बाहर गया हुआ था, उसकी अनुपस्थिति में शेष बच्चे खेलने कूदने तथा शोर मचाने लगे। हकीकत राय इस खेल में सम्मिलित नहीं हुआ और पढ़ने लगा इस पर सभी लड़के मिलकर उसे तंग करने लगे। उन्होंने हिंदू धर्म की निंदा करना प्रारंभ कर दिया और मां दुर्गा के प्रति अपशब्दों का प्रयोग भी करने लगे। धार्मिक हकीकत अपमान को सहन न कर सका और उत्तेजित होकर उसने भी मुसलमानों के पैगंबर की लड़की बीबी फातिमा के लिए उन्ही शब्दों को दोहराने की चेतावनी दी।
                                      मौलवी के वापस आने पर मुसलमान लड़कों ने हकीकत राय की शिकायत की कि इसने बीबी फातिमा को गाली दी है। मौलवी के पूछने पर हकीकत ने निर्भयता से सारी बात सच-सच बता दी और कहा कि इन लड़कों ने तो उनकी देवी मां दुर्गा को गालियां दी थी किंतु मौलवी ने उसकी सभी बातें अनसुनी कर उसको थप्पड़ और लात घुसे मार कर बेहोश कर दिया। होश में आने पर मौलवी हकीकत राय को काजी के पास ले गया।
                                   काजी ने हकीकत से कहा तुमने बहुत बड़ा अपराध किया है। इसका एक ही प्रायश्चित है कि तुम इस्लाम स्वीकार कर मुसलमान हो जाओ नहीं तो बीबी फातिमा को गाली देने के अपराध में तुम्हारा सिर काट दिया जाएगा। हकीकत ने मुस्कुराकर कहा कि मैं अपने प्राणों से प्यारे हिंदू धर्म को तिलांजलि नहीं दे सकता। मौत का भय दिखाकर आप मुझे विचलित नहीं कर सकते क्योंकि हकीकत को ही तुम्हारी तलवार काट सकती है, आत्मा को नहीं। मेरा धर्म कहता है कि आत्मा अमर है। एक बालक के मुख से ज्ञान और स्वाभिमान की बातें सुनकर काजी आश्चर्यचकित रह गया।
                                  यदि तुम मुसलमान हो जाओ तो तुमको इतना धन दिया जाएगा की संपूर्ण जीवन भोग विलास में व्यतीत करोगे काजी ने उसे लालच देना चाहा। मैं मुसलमान बन सकता हूं यदि आप मुझे विश्वास दिला दें कि मुसलमान बन जाने से मैं अमर हो जाऊंगा। यह कैसे हो सकता है? जो इस संसार में आया है वह एक ना एक दिन तो मरेगा ही - काजी ने कहा। मरना ही है तो उससे कैसा डर। मुसलमान बन जाने पर भी मैं अमर नहीं हो सकता तो फिर मुसलमान बनने से क्या फायदा। अंत में अपने को पराजित अनुभव करते हुए काजी ने कुरान की शरीयत का नाम लेकर हकीकत को कोड़े लगाए और हथकड़ियों से जकड़ कर कारागार में डाल दिया।
                                   इस समाचार को सुनकर माता पिता काजी के पास आए और काजी से क्षमा मांगते हुए कहा यह बच्चा है, गलती से इसके मुंह से अपशब्द निकल गए होंगे। इस पर भी काजी को दया नहीं आई और उसने पूर्व दी सजा को बनाए रखा। माता ने ममत्व के वशीभूत होकर हकीकत से क्षमा मांगने एवं मुसलमान बन जाने को कहा। इस पर हकीकत ने माता से कहा- माता तूने ही तो मुझको प्राचीन गाथाएं सुना कर धर्म के मर्म को समझाया था। मैं इस पवित्र कार्य से कदापि पीछे नहीं  हटूंगा। धर्म के लिए एक प्राण तो क्या यदि मुझे हजार प्राण भी न्योछावर करने पड़े तो मैं प्रसन्नता-पूर्वक तैयार हूं। यह पाठ तुम्हारी गोदी में ही बैठकर तो सीखा है।
                                 मां की आंखों में आंसू आ गए वह निरुत्तर थी। नगर के सभी हिंदू एकत्रित होकर नगर प्रमुख अमीर बेग के पास गए और हकीकत को बच्चा जानकर क्षमा करने को कहा। अमीर बेग ने स्वयं निर्णय न देकर मुकदमा लाहौर के मुख्य काजी के पास भेज दिया। उन दिनों दिल्ली में बादशाह मोहम्मद शाह का राज्य था। उस सुबह का सूबेदार खान बहादुर जकारिया खान था। सभी जगह मुस्लिम धर्मांधता का बोलबाला था। मुकदमा लाहौर के मुख्य काजी के न्यायालय में प्रस्तुत हुआ, लेकिन परिणाम वही इस्लाम स्वीकार करो या मृत्युदंड।
                             हकीकत ने काजी को कहा प्रभु ने मुझे हिंदू घर में जन्म दिया है और आपको मुस्लिम घर में इसलिए आपका मुझे इस्लाम स्वीकार करने के लिए बातें करना ईश्वर के कार्य में हस्तक्षेप है। भूलिए मत जो कोई ईश्वर के कार्य में हस्तक्षेप करता है, काफिर वही है मैं नहीं। हकीकत की पत्नी भी न्यायालय में उपस्थित थी उसने भी मुसलमान बन प्राणों को बचाने की प्रार्थना की, तो हकीकत राय ने कहा तुम्हारा मस्तक तो गर्व से ऊंचा होना चाहिए कि तुम्हारा पति अपने धर्म पर अडिग रहा है।
                                 अंत में पूर्व दंड के अनुसार एक खुले मैदान में हजारों महिला पुरुषों की भीड़ के बीच सन 1734 बसंत पंचमी के दिन काजी के आदेश से जल्लाद ने उस वीर बालक का तलवार से शीश काट दिया। लाहौर से लगभग 5 किलोमीटर दूर रावी नदी के तट पर खोजें शाह गांव के निकट चंदन की चिता बनाकर वीर बालक का अंतिम संस्कार किया गया। बाद में वहां समाधि बनाई गई। भारत विभाजन के बाद समाधि स्थल बना कर वहां प्रतिवर्ष बसंत पंचमी के दिन मेला लगता है।
                               बलिदानी वीर हकीकत की पत्नी बाद में अपने पिता के घर बटाला आ गई और माता-पिता को समझाने के बाद बटाला में ही आत्मोत्सर्ग किया। आज भी प्रतिवर्ष वहां पर मेला लगता है वीर हकीकत का बलिदान अलौकिक और अद्वितीय है। वीर हकीकत ने हंसते-हंसते धर्म के लिए अपना बलिदान देकर समाज में नवचेतना का संचार किया।


*जय श्री राम*

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स्वस्थ रहने के लिए कुछ जरूरी बातें - जीवन पद्धति




स्वस्थ रहने के लिए कुछ जरूरी बातें

1. घर में शौचालय और स्नानघर अलग रहे तो अच्छा।
2. हाथ पैर मुंह धोकर ही खाना।
3. हर निवाले को धीरे-धीरे चबाकर ही खाना।
4. भोजन या अल्पाहार के बाद उपयोग किए बर्तनों को तुरंत मांज कर रखना। बिना धोए फिर से उपयोग में नहीं लाना।
5. घर में उपयोग होने के बाद जल निकास की योग्य व्यवस्था रहे।
6. शाम को बच्चों का खेलना अनिवार्य रहे। बच्चे अनेक तरह तरह के खेल खेलें। तब ही शरीर के सभी अंग क्रियाशील रहेंगे।
7. उंगलियों के नाखूनों को चबाना नहीं चाहिए।
8. हर दिन कम से कम 30 मिनट के आयाम करना चाहिए।
9. प्रातः बेड कॉफी या बेड टी की आदत ठीक नहीं है। यह स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक है।
10. खड़े-खड़े रसोई बनाना शरीर के लिए हानिकारक है इससे कमर दर्द, स्याटिका, संधिवात इत्यादि रोग होते हैं।
11. मेज के सामने बैठकर खाने के बारे में भी सोचना आवश्यक है। जमीन पर सुखासन में बैठकर खाना अति उत्तम एवं आरोग्य दायक है। खड़े-       खड़े खाना भी ठीक नहीं है।
12. घर में कोई बीमार पड़े तो डरना नहीं। प्रारंभिक चिकित्सा घर में सावधानी से करें।
13. रोगियों या बीमारों की सेवा, उपचार, पथ्य पालन इत्यादि प्रेम से करने  का अभ्यास हो।
14. हर नौजवान को वश में एक दो बार रक्तदान करना चाहिए।
15. मृत्यु के बाद नेत्रदान करने के बारे में सब जागृत रहे।
16. मृत्यु अनिवार्य है। इसको समझ कर किसी को भी मृत्यु से डरना नहीं चाहिए।
17. शौचालय अपने देश के तरीके का रहे। कमोड बुजुर्ग और रोगियों को ठीक रहेगा, स्वस्थ युवकों के लिए नहीं है।
18. चीनी के स्थान पर गुड खाना अच्छा होता है।
19. सफेद नमक नहीं खाना चाहिए इसके स्थान पर सेंधा नमक व काले नमक का उपयोग करना चाहिए।
20. मिर्ची के स्थान पर काली मिर्ची खाना अच्छा है।
21. बाहर से घर वापस आने पर तुरंत हाथ पांव धोने चाहिए।


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सञ्चलन गणगीत गीत - संगठन गढ़े चलो सुपंथ पर बढ़े चलो



***सञ्चलन गीत***

संगठन गढ़े चलो सुपंथ पर बढ़े चलो,
 भला हो जिसमे देश का वो काम सब किए चलो ||

 युग के साथ मिलकर सब कदम बढ़ाना सीख लो
 एकता के स्वर में गीत गुनगुनाना सीख लो
 भूलकर भी मुख से जाति पंथ की ना बात हो
 भाषा प्रांति के लिए कभी ना रक्तपात हो
 फूट का भरा घड़ा है फोड़कर बढ़े चलो ||१||
 भला हो जिसमे देश का वो काम सब किए चलो

 आ रही है आज चारों ओर से यही पुकार
 हम करेंगे त्याग मातृभूमि के लिए अपार
 कष्ट जो मिलेंगे मुस्कुराते सब सहेंगे हम
 देश के लिए सदा जियेंगे और मरेंगे हम
 देश का ही भाग्य अपना भाग्य है यह सोच लो ||२||
भला हो जिसमे देश का वो काम सब किए चलो
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अमृत वचन - श्री गुरूजी




प्रचलित प्रेरक कथन एवं सुविचार  

परम पूज्य श्री गुरु जी ने कहा है -

                   "यह राष्ट्र हजारों वर्षों से हिंदू राष्ट्र है, हिंदू राष्ट्र बनाना नहीं है, इसे स्थापित नहीं करना है, इसकी घोषणा भी नहीं करनी अपितु हिंदू राष्ट्र का सर्वांगीण विकास करना है।"
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सुभाषित - गोपाल सांघिक: कृष्णो




[2]

सुभाषित दो शब्दों सु + भाषित से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है सुन्दर भाषा में कहा गया| सुभाषित जीवन के दीर्घकालिक अनुभवों के भण्डार हैं जिनमे सुखी और आदर्श जीवन की अनमोल सीख छिपी हुई है | जैसे - 



"गोपाल सांघिक: कृष्णो,
रामो वानर संघिक:।
सद्भुक्षु सांघिको बुद्धो, 
महात्मानो हि संघिक:।।"

अर्थात

"श्री कृष्ण ने गोपालको का संगठन किया, 
श्री राम ने वानरों का संगठन किया। 
भगवान बुद्ध सद्भिक्षुओं के संगठन कर्ता बने।
इस प्रकार महात्मा संगठन कर्ता ही होते हैं।"



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झबरेड़ा नगर पद संचलन 2018



राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ झबरेड़ा नगर मे पद संचलन के कुछ ग्रुप  फोटो 
नगर - झबरेड़ा जिला - रुड़की विभाग - हरिद्वार प्रान्त - उत्तराखंड 
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ झबरेड़ा नगर मे पद संचलन के कुछ ग्रुप  फोटो 
नगर - झबरेड़ा जिला - रुड़की विभाग - हरिद्वार प्रान्त - उत्तराखंड 

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झबरेड़ा नगर अभ्यास वर्ग 2018


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ झबरेड़ा नगर मे नगर अभ्यास  वर्ग फोटो 
नगर - झबरेड़ा जिला - रुड़की विभाग - हरिद्वार प्रान्त - उत्तराखंड 
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ झबरेड़ा नगर  
नगर - झबरेड़ा जिला - रुड़की विभाग - हरिद्वार प्रान्त - उत्तराखंड 

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झबरेडा नगर सहभोज एवं बाल शिविर 2018



राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ झबरेड़ा नगर मे नगर सहभोज एवं बल शिविर वर्ग फोटो 
नगर - झबरेड़ा जिला - रुड़की विभाग - हरिद्वार प्रान्त - उत्तराखंड 
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ झबरेड़ा नगर  
नगर - झबरेड़ा जिला - रुड़की विभाग - हरिद्वार प्रान्त - उत्तराखंड 

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झबरेडा नगर देव दर्शन एवं शाखा दर्शन 2018


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ झबरेड़ा नगर मे देव दर्शन एवं शाखा दर्शन फोटो 
नगर - झबरेड़ा जिला - रुड़की विभाग - हरिद्वार प्रान्त - उत्तराखंड 
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ झबरेड़ा नगर  
नगर - झबरेड़ा जिला - रुड़की विभाग - हरिद्वार प्रान्त - उत्तराखंड 

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भारत माँ के चरण कमल में - MP3


भारत माँ के चरण कमल पर तन मन धन कर दे न्यौछावर
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सुभाषित - विरोधिनोअपि श्रोतव्यं




[1]
सुभाषित दो शब्दों सु + भाषित से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है सुन्दर भाषा में कहा गया| सुभाषित जीवन के दीर्घकालिक अनुभवों के भण्डार हैं जिनमे सुखी और आदर्श जीवन की अनमोल सीख छिपी हुई है | जैसे - 



विरोधिनोअपी श्रोतव्यं, 
आत्मलीनतयामतम |
तात्कालम न विरोद्धव्यम, 
यथाकालं तू खंडयेत ||



***अर्थ***

विरोधियों के विचार को भी 

आत्मीयतापूर्वक सुनना चाहिए 
और तत्काल उसका विरोध
नहीं करना चाहिए| 
बाद  में उचित समय पर
बात का खंडन करना चाहिए |





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